नमस्कार मित्रो, क्या हमारे राजनेता सच बोलते है इस प्रश्न पर हमारी प्रतिक्रियाएं काफी भिन्न हो सकती है जैसे हो सकता है प्रश्न सुनते ही आपके मन में छणिक व्यंग उत्पन्न हो " नेता और सच". जैसे कि नेता ने तो जिंदगी में सच ही नही बोला यह व्यंग छणिक हो सकता है परन्तु यदि बर्तालाप कुछ अधिक देर तक जारी रखा जाये तो निश्चित रूप से आपके विचार बदलेंगे और तब आप कह सकते है की कुछ नेता तो अच्छे है. या आपके आदर्श नेताओं को छोड़कर अन्य नेताओ पर आपका व्यंग उचित है. यह भी संभव है कि आप किसी विशेष राजनीतिक दल को श्रेष्ठ माने और नेताओ के प्रश्न पर कहे की "थोडा तो सब जगह चलता है ".
वैसे पिछले चुनाव को देखते हुए इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता कि कुछ व्यक्ति उस छणिक व्यंग के अधिक समीप ही बने रहेंगे क्योंकि सबने देखा की अल्प ही सही परन्तु चुनाव में NOTA का प्रयोग तो हुआ था.
खैर, आप कुछ भी कहें हमें तो चर्चा इस बात पर करनी है. कि कोई राजनेता इतनी जल्दी आपका महान व्यक्तित्व कैसे बन जाता है और वही राजनेता आपके मन से उतर जाता है.
कभी कभी तो हमारे यही महान व्यक्तित्व (बात केबल नेताओ की नहीं है) हमारे मन पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ते है कि यदि कोई व्यक्ति आपके उस महान व्यक्तित्व पर सत्य अथवा असत्य लांछन लगाता है तो हम उस लांछन लगाने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व पर कई प्रकार के आरोप लगाने से भी नहीं चूकते.
कुछ भी हो हम कम से कम इतने दिमाग वाले तो जरूर होते है कि ठीक नही लगने वाले व्यक्ति के ऊपर बिना किसी सुबूत के उस पर लगाये गए आरोपों को साबित करने में कोई परेशानी मह्सूस ही नही करते.
चलो मैं अपनी बात पर आता हूँ कुछ समय पहले मेरे ऊपर एक राजनेता की छाप इस तरह पड़ी और फिर मिट गयी जैसे किसी प्रकाश स्रोत के आगे से किसी बस्तु के निकल जाने पर उसकी छाया आकर चली जाती है. उस छाया का ग्रहण मुझ पर से तब हटना शुरू हुआ जब मैंने यह सोचा की क्यों यह उस व्यक्ति विशेष पर लगे आरोपों में उसकी सत्यता और आरोप लगाने वाले की त्रुटि को निकालने की कोशिश मेरे द्वारा बिना किसी स्वार्थ के की जा रही है. मैंने इस बात पर अपना ध्यान लाकर विचार करना आरम्भ किया तब मुझे ज्ञात हुआ की यही प्रभाव है उस व्यक्ति विशेष का जो बिना उसके जाने ही मुझ पर पड़ गया. मै सोचता हूँ शायद यह उस ब्रेन वाश का अतिशूक्ष्म स्वरुप था जो की अधिकतर आतंकबादियों पर प्रयोग किया जाता है.
यह तो मुझ पर बिना किसी के कार्य किये प्रभावी होना शुरू हो चूका था. परन्तु बिना किसी माध्यम के तो यह असंभव ही है. यह माध्यम media था. हालाँकि media ऐसा कदापि नही चाहता होगा. ऐसा उस व्यक्ति के उन कार्यो को लगातार जानने के बाद हुआ जो कार्य मेरी द्रष्टि में उत्तम थे. मैंने उस व्यक्ति को उसके केवल उन्ही कार्यो के आधार पर जो की मेरी द्रष्टि में उत्तम थे उसे भी उत्तम मान लिया. तथा उस व्यक्ति के साथ मेरी सहानुभूति भी थी क्यूंकि मुझे प्रतीत हुआ कि यदि अन्धो में एक व्यक्ति काना हो तो उस व्यक्ति पर अंधे पूर्ण रूप से विश्वास करने में असमर्थ होंगे क्योंकि वह व्यक्ति उन अन्धो से उतना अधिक समानता नही रखता जितना की वह चाहते है. यह मुझे झूठ की नगरी में राजा हरिशचंद्र की भांति प्रतीत हो रहा था.
हमें किसी भी बात को मानने के लिए एक साक्ष्य की आवश्यकता होती है इस साक्ष्य की आवश्यकता बचपन से शुरू उम्र के साथ साथ बडती है. हमें यह साक्ष्य हमारे मस्तिष्क से प्राप्त होता है. परन्तु मस्तिष्क इसे निर्मित करने के लिए व्यक्ति विशेष के कार्यो के निचोड़ से उसके विचारो का आंकलन करने के बाद उसे हमारे "आदर्श" के विचारो के साथ मिलाकर उनका तुलनात्मक अध्ययन करता है और इस प्रकार एक व्यक्ति विशेष का आंकलन हो जाता है. जो कि हमें हमारे "आदर्श के विचारों से निकटता" के पदों में प्राप्त होता है. अब यह जो हमारा या आपका "आदर्श" है. इसका निर्माण भी हम ही करते हैं परन्तु फिर भी यह आवश्यक नही कि यह हमारे विचारो के समान हो क्यूंकि हम स्वयं का भी आंकलन उस भांति कर चुके होते है और शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा हो जो की स्वयं की द्रष्टि में आदर्श हो.
यह आदर्श एक अनंत की तरह होता है जिसे प्राप्त तो नही किया जा सकता परन्तु उससे निकटता में वृद्धि भी अपना विशेष महत्व रखती है. हमारा कोई भी महान व्यक्तित्व तुलनात्मक रूप से इस आदर्श के अधिक निकट होता है. यह आदर्श भले ही अनंत की तरह होता है परन्तु सभी के आदर्श अलग अलग होते है.
अब चूँकि आदर्श से दूरी में असमानता है तो महान व्यक्तित्वों में भी असमानता होगी अतएव उनके प्रभावों में असमानता तो निश्चित ही है.
इस प्रभाव से यदि आप बचना चाहते है तो आपको "शून्य होकर सोचना" सीखना होगा.
वैसे पिछले चुनाव को देखते हुए इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता कि कुछ व्यक्ति उस छणिक व्यंग के अधिक समीप ही बने रहेंगे क्योंकि सबने देखा की अल्प ही सही परन्तु चुनाव में NOTA का प्रयोग तो हुआ था.
खैर, आप कुछ भी कहें हमें तो चर्चा इस बात पर करनी है. कि कोई राजनेता इतनी जल्दी आपका महान व्यक्तित्व कैसे बन जाता है और वही राजनेता आपके मन से उतर जाता है.
कभी कभी तो हमारे यही महान व्यक्तित्व (बात केबल नेताओ की नहीं है) हमारे मन पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ते है कि यदि कोई व्यक्ति आपके उस महान व्यक्तित्व पर सत्य अथवा असत्य लांछन लगाता है तो हम उस लांछन लगाने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व पर कई प्रकार के आरोप लगाने से भी नहीं चूकते.
कुछ भी हो हम कम से कम इतने दिमाग वाले तो जरूर होते है कि ठीक नही लगने वाले व्यक्ति के ऊपर बिना किसी सुबूत के उस पर लगाये गए आरोपों को साबित करने में कोई परेशानी मह्सूस ही नही करते.
चलो मैं अपनी बात पर आता हूँ कुछ समय पहले मेरे ऊपर एक राजनेता की छाप इस तरह पड़ी और फिर मिट गयी जैसे किसी प्रकाश स्रोत के आगे से किसी बस्तु के निकल जाने पर उसकी छाया आकर चली जाती है. उस छाया का ग्रहण मुझ पर से तब हटना शुरू हुआ जब मैंने यह सोचा की क्यों यह उस व्यक्ति विशेष पर लगे आरोपों में उसकी सत्यता और आरोप लगाने वाले की त्रुटि को निकालने की कोशिश मेरे द्वारा बिना किसी स्वार्थ के की जा रही है. मैंने इस बात पर अपना ध्यान लाकर विचार करना आरम्भ किया तब मुझे ज्ञात हुआ की यही प्रभाव है उस व्यक्ति विशेष का जो बिना उसके जाने ही मुझ पर पड़ गया. मै सोचता हूँ शायद यह उस ब्रेन वाश का अतिशूक्ष्म स्वरुप था जो की अधिकतर आतंकबादियों पर प्रयोग किया जाता है.
यह तो मुझ पर बिना किसी के कार्य किये प्रभावी होना शुरू हो चूका था. परन्तु बिना किसी माध्यम के तो यह असंभव ही है. यह माध्यम media था. हालाँकि media ऐसा कदापि नही चाहता होगा. ऐसा उस व्यक्ति के उन कार्यो को लगातार जानने के बाद हुआ जो कार्य मेरी द्रष्टि में उत्तम थे. मैंने उस व्यक्ति को उसके केवल उन्ही कार्यो के आधार पर जो की मेरी द्रष्टि में उत्तम थे उसे भी उत्तम मान लिया. तथा उस व्यक्ति के साथ मेरी सहानुभूति भी थी क्यूंकि मुझे प्रतीत हुआ कि यदि अन्धो में एक व्यक्ति काना हो तो उस व्यक्ति पर अंधे पूर्ण रूप से विश्वास करने में असमर्थ होंगे क्योंकि वह व्यक्ति उन अन्धो से उतना अधिक समानता नही रखता जितना की वह चाहते है. यह मुझे झूठ की नगरी में राजा हरिशचंद्र की भांति प्रतीत हो रहा था.
हमें किसी भी बात को मानने के लिए एक साक्ष्य की आवश्यकता होती है इस साक्ष्य की आवश्यकता बचपन से शुरू उम्र के साथ साथ बडती है. हमें यह साक्ष्य हमारे मस्तिष्क से प्राप्त होता है. परन्तु मस्तिष्क इसे निर्मित करने के लिए व्यक्ति विशेष के कार्यो के निचोड़ से उसके विचारो का आंकलन करने के बाद उसे हमारे "आदर्श" के विचारो के साथ मिलाकर उनका तुलनात्मक अध्ययन करता है और इस प्रकार एक व्यक्ति विशेष का आंकलन हो जाता है. जो कि हमें हमारे "आदर्श के विचारों से निकटता" के पदों में प्राप्त होता है. अब यह जो हमारा या आपका "आदर्श" है. इसका निर्माण भी हम ही करते हैं परन्तु फिर भी यह आवश्यक नही कि यह हमारे विचारो के समान हो क्यूंकि हम स्वयं का भी आंकलन उस भांति कर चुके होते है और शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा हो जो की स्वयं की द्रष्टि में आदर्श हो.
यह आदर्श एक अनंत की तरह होता है जिसे प्राप्त तो नही किया जा सकता परन्तु उससे निकटता में वृद्धि भी अपना विशेष महत्व रखती है. हमारा कोई भी महान व्यक्तित्व तुलनात्मक रूप से इस आदर्श के अधिक निकट होता है. यह आदर्श भले ही अनंत की तरह होता है परन्तु सभी के आदर्श अलग अलग होते है.
अब चूँकि आदर्श से दूरी में असमानता है तो महान व्यक्तित्वों में भी असमानता होगी अतएव उनके प्रभावों में असमानता तो निश्चित ही है.
इस प्रभाव से यदि आप बचना चाहते है तो आपको "शून्य होकर सोचना" सीखना होगा.